कमाठीपुरा की कहानी

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मुंबई |मुंबई के रेड लाइट एरिया कमाठीपुरा की कहानी गंगूबाई काठियावाड़ी, एक सेक्स फिल्म के बजाय एक औरत की संवेदनशील कहानी है। गंगा (आलिया भट्ट) कैसे जिस्म बेचने की दुनिया का हिस्सा बन जाती है और कैसे यहां की रानी बनकर यहां की लड़कियों और औरतों के दिलों पर राज करती है, यह बताया गया है। पहले एक-दो दिन शायद महिला  ऑडियंस इस फिल्म को देखने से कतराएगी लेकिन जैसे ही फिल्म की रिपोर्ट बाहर निकलेगी, इस फिल्म को औरतें ही सबसे ज्यादा चलाएंगी और इसके कई कारण हैं। सबसे पहला कारण तो यह कि यह फिल्म एक औरत की दर्द भरी कहानी है और इसमें वल्गर सीन और चमड़ी का प्रदर्शन ज्यादा नहीं है, दूसरी बात यह औरतों के हक के लिए एक आधुनिक विचारधारा वाली फिल्म है। तीसरी बात इसमें अजय देवगन का किरदार औरतों की इज्जत खूब करता है जो बात महिला दर्शकों के मन को जीत लेगी। सबसे बड़ी बात आलिया भट्ट की एक्टिंग! बहुत लोगों को यह बात सता रही थी कि आलिया जैसी कद और उम्र में छोटी एक्ट्रेस क्या इस किस्म के रोल में जचेगी? न सिर्फ जचती है बल्कि आलिया भट्ट के परफॉर्मेंस को अवार्ड मिल सकते हैं। आलिया ने गंगूबाई के किरदार को इतना बखूबी निभाया है कि उनकी जितनी तारीफ की जाए, कम है। कहानी: फिल्म की कहानी हुसैन जैदी की किताब ‘माफिया क्वींस ऑफ मुंबई’ पर आधारित है और इस कहानी का दिल सही जगह पर है। पटकथा संजय लीला भंसाली और उत्कर्षिनी वशिष्ठ में इतने अच्छे से लिखी है कि ड्रामा बहुत लंबा होने के बावजूद, दर्शक को बोर नहीं होने देता है। कुछ सीन जो आपको सिनेमा से बाहर निकलने के बाद, दिनों और महीनों तक याद रहेंगे; जब गंगा का बॉयफ्रेंड उसे कोठे पर छोड़ कर भाग जाता है, जब एक कस्टमर गंगा उर्फ गंगूबाई को बेरहमी से मारता है और वह चीखती है। रहीम लाला (अजय देवगन) उसी कस्टमर का उतनी ही बेरहमी से कत्ल करता है, जब गंगूबाई 10 साल बाद अपनी मां से ट्रंक कॉल बुक करके फोन पर बात करती है। गंगूबाई और रजियाबाई (विजय राज) भिड़ जाती हैं। जब वह जर्नलिस्ट (जनरलिस्ट) को अपना दोस्त बना लेती है, गंगूबाई जीवन में पहली बार तालियों की गूंज के बीच भाषण देती है (यह फिल्म का सबसे बढ़िया लिखा सीन है पर इसके संवाद बेहतरीन है)। वैसे उत्कर्षिनी वशिष्ठ और प्रकाश कपाड़िया के संवादों की तारीफों के पुल बांधने चाहिए क्योंकि वह सीधे दिल में उतर जाते हैं। एक्टिंग: जैसे पहले बताया, आलिया भट्ट फिल्म का पूरा भार अपने कंधों पर उठाती हैं। उन्होंने गंगूबाई की भूमिका बेहतरीन तरीके से निभाई है जिसके लिए उन्हें नेशनल अवार्ड और बहुत सारे और भी अवार्ड से नवाजा जा सकता है। वह बहुत खूबसूरत लगी हैं और उनके कपड़े (डिजाइनर शीतल इकबाल शर्मा) चर्चा का विषय बन जाएंगे। अजय देवगन गेस्ट अपीरियंस में छा जाते हैं। सीमा पाहवा, शीला मासी की भूमिका में चमकती हैं। विजय राज नए अंदाज में एक्स्ट्राऑर्डिनरी हैं। जिम सर्भ जर्नलिस्ट फैजी के रूप में मन मोह लेते हैं। शांतनु माहेश्वरी अफ़शान की भूमिका में, इंदिरा तिवारी कमली के किरदार में, अनमोल कजानी बिरजू के रोल में और हुमा कुरैशी एक डांस में, अच्छा सपोर्ट देते हैं। निर्देशन और संगीत: संजय लीला भंसाली के निर्देशन की दाद देनी पड़ेगी। लेकिन उनका संगीत इस बार उम्मीद से कम है। ढोलीडा गाना मजेदार है और उसके बोल (कुमार के) भी बढ़िया हैं। झूमे रे गोरी भी अच्छा गाना है लेकिन बाकी गाने गुनगुनाने लायक नहीं है और उनके बोल भी (ए एम तुराज और कुमार) जुबान पर आसानी से नहीं चढेंगे। कृति महेश के डांस बेहतरीन हैं। संचित बल्हारा और अंकित बल्हारा का पार्श्व संगीत आउटस्टैंडिंग है। सुदीप चैटर्जी के कैमरा वर्क को फुल मार्ग देंगे। उन्होंने बहुत शानदार फिल्म बनाई है और आलिया को बड़ा ग्लैमरस दिखाया है। शाम कौशल के एक्शन सीन रियलिस्टिक लगते हैं। संजय लीला भंसाली का संकलन सुपर-शार्प है।